A poem from my diary - written long back... after the kargil war.
जांबाज़ जवानों ने
वीरता बहुत दिखलाई,
दुश्मनों को रौंद कर
चौकियां वापस पाई,
सीने पर झेली गोलियां,
मिट्टी को खून से रंग डाला,
दुश्मन डर कर भाग गए,
ऐसा मोर्चा था संभाला,
शूरवीरों की शहादत,
आखिरकार रंग ले आई,
दुश्मनों ने फिर एक बार
देखो है मुंह की खाई,
वो हार गए क्यूंकि
बेचारे नहीं पाए ये पहचान,
कि किसी ज़मीं पर नहीं,
हमारे दिलों में रहता है हिंदुस्तान...
Sunday, August 15, 2010
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